भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव रामनरेश पाण्डेय ने बिहार भूमि निबंधन नियमावली में किए गए जटिल और जनविरोधी बदलाव पर विरोध प्रकट किया है। भूमि निबंधन में राज्य सरकार ने जन विरोधी बदलाव किया है। इस बदलाव से भूमि निबंधन में कठिनाई बढ़ गई है। सरकार ई निबंधन पोर्टल पर 13 प्रकार की अनिवार्य जानकारियों की बाध्यता को तत्काल सरल करते हुए ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ऑफलाइन निबंधन की वैकल्पिक व्यवस्था बहाल करे। ई-निबंधन प्रक्रिया को सरल, सुलभ और गरीब-हितैषी बनाया जाए।
भाकपा राज्य सचिव ने बयान जारी कर कहा कि बिहार सरकार ने भूमि निबंधन नियमावली में संशोधन कर अब जमीन की रजिस्ट्री के लिए ऑनलाइन ई-निबंधन पोर्टल के माध्यम से 13 प्रकार की जानकारियाँ देना अनिवार्य कर दिया है। इसमें जमीन का भू-नक्शा, खाता-खेसरा, दाखिल खारिज का विवरण, विक्रेता-क्रेता का आधार-पैन लिंकेज, बैंक विवरण, स्वघोषणा पत्र आदि शामिल हैं। सरकार का दावा है कि यह पारदर्शिता और डिजिटलीकरण के लिए किया गया है। व्यवहार में यह व्यवस्था सामान्य जनता, विशेषकर छोटे किसानों, भूमिहीनों, महिला और ग्रामीण क्रेता-विक्रेताओं के लिए बेहद जटिल और परेशानी भरी हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट, कंप्यूटर और डिजिटल साक्षरता का अभाव है। 13 प्रकार की जानकारी जुटाना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन है। प्रक्रिया जटिल होने से लोग दलालों और साइबर कैफे संचालकों पर निर्भर हो गए हैं। इससे रिश्वतखोरी और अवैध वसूली बढ़ी है। छोटे और सीमांत किसानों के पास पुराने दस्तावेज अधूरे हैं या खो गया है। वे रजिस्ट्री कराने में असमर्थ हो रहे हैं। जमीन की खरीद-बिक्री ठप होने से ग्रामीण क्षेत्रों में पूंजी का प्रवाह रुक गया है, जिससे कृषि और ग्रामीण रोजगार प्रभावित हो रहा है। स्पष्ट है कि डिजिटल सुविधा के नाम पर यह बदलाव आम जनता को परेशान करने और भूमि को कॉरपोरेट व बड़े भू-माफियाओं के हवाले करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी राज्य सरकार से ई-निबंधन पोर्टल पर 13 प्रकार की अनिवार्य जानकारियों की बाध्यता को तत्काल सरल करने और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ऑफलाइन निबंधन की वैकल्पिक व्यवस्था बहाल करने की मांग करती है। छोटे किसानों और 5 एकड़ से कम जोत वाले भूमिधारकों को दस्तावेजी छूट दी जाए। प्रखंड और अंचल स्तर पर निःशुल्क सहायता केंद्र स्थापित किए जाएँ ताकि लोग बिना दलाल के रजिस्ट्री करा सके। प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए किसानों, अधिवक्ताओं और जनप्रतिनिधियों से परामर्श कर नियमावली में संशोधन किया जाए।

भाकपा राज्य सचिव ने बयान जारी कर कहा कि बिहार सरकार ने भूमि निबंधन नियमावली में संशोधन कर अब जमीन की रजिस्ट्री के लिए ऑनलाइन ई-निबंधन पोर्टल के माध्यम से 13 प्रकार की जानकारियाँ देना अनिवार्य कर दिया है। इसमें जमीन का भू-नक्शा, खाता-खेसरा, दाखिल खारिज का विवरण, विक्रेता-क्रेता का आधार-पैन लिंकेज, बैंक विवरण, स्वघोषणा पत्र आदि शामिल हैं। सरकार का दावा है कि यह पारदर्शिता और डिजिटलीकरण के लिए किया गया है। व्यवहार में यह व्यवस्था सामान्य जनता, विशेषकर छोटे किसानों, भूमिहीनों, महिला और ग्रामीण क्रेता-विक्रेताओं के लिए बेहद जटिल और परेशानी भरी हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट, कंप्यूटर और डिजिटल साक्षरता का अभाव है। 13 प्रकार की जानकारी जुटाना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन है। प्रक्रिया जटिल होने से लोग दलालों और साइबर कैफे संचालकों पर निर्भर हो गए हैं। इससे रिश्वतखोरी और अवैध वसूली बढ़ी है। छोटे और सीमांत किसानों के पास पुराने दस्तावेज अधूरे हैं या खो गया है। वे रजिस्ट्री कराने में असमर्थ हो रहे हैं। जमीन की खरीद-बिक्री ठप होने से ग्रामीण क्षेत्रों में पूंजी का प्रवाह रुक गया है, जिससे कृषि और ग्रामीण रोजगार प्रभावित हो रहा है। स्पष्ट है कि डिजिटल सुविधा के नाम पर यह बदलाव आम जनता को परेशान करने और भूमि को कॉरपोरेट व बड़े भू-माफियाओं के हवाले करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी राज्य सरकार से ई-निबंधन पोर्टल पर 13 प्रकार की अनिवार्य जानकारियों की बाध्यता को तत्काल सरल करने और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ऑफलाइन निबंधन की वैकल्पिक व्यवस्था बहाल करने की मांग करती है। छोटे किसानों और 5 एकड़ से कम जोत वाले भूमिधारकों को दस्तावेजी छूट दी जाए। प्रखंड और अंचल स्तर पर निःशुल्क सहायता केंद्र स्थापित किए जाएँ ताकि लोग बिना दलाल के रजिस्ट्री करा सके। प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए किसानों, अधिवक्ताओं और जनप्रतिनिधियों से परामर्श कर नियमावली में संशोधन किया जाए।
