सोमवार को बिहार विधान सभा के पाँच दिवसीय तृतीय सत्र के शुभारम्भ करते हुए बिहार विधान सभा ने सदन को सम्बोधित करते हुए कहा —–
माननीय सदस्यगण, आप सभी का बिहार विधान सभा के पाँच दिवसीय तृतीय सत्र में हृदय की गहराईयों से स्वागत, अभिनंदन एवं शुभकामनाएँ ।
भारतीय लोकतंत्र का यह पवित्र सदन लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च मंच है, जहाँ जनता की अपेक्षाओं, आकांक्षाओं एवं समस्याओं का संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप समाधान खोजा जाता है। यह केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि जनभावनाओं, लोककल्याण और संविधान की आत्मा का सजीव प्रतीक है। यहाँ होने वाला प्रत्येक विचार-विमर्श करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है । इसलिए यह सदन संवाद, शालीनता, मर्यादा और उत्तरदायित्व का सर्वोच्च मंच है।
सबसे पहले, मैं उन सभी माननीय सदस्यों को हार्दिक बधाई देता हूँ, जिन्होंने हाल ही में बिहार लोक प्रशासन एवं ग्रामीण विकास संस्थान (बिपार्ड), गयाजी में आयोजित दो दिवसीय प्रबोधन कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक भाग लिया। उक्त कार्यक्रम में संसदीय प्रक्रिया, विधायी एवं बजटीय कार्य, समिति की कार्य प्रणाली, नेभा और भविष्य की संभावनाएं, सदस्यों के विशेषाधिकार एवं प्रोटोकॉल, संसदीय आचरण तथा जनप्रतिनिधियों की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर देश एवं राज्य के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। मुझे विश्वास है कि इस प्रबोधन कार्यक्रम से प्राप्त ज्ञान और अनुभव इस सदन की कार्यवाही को और अधिक सार्थक, अनुशासित तथा जनोन्मुख बनाने में सहायक होंगे।

ऋग्वेद का यह मंगल मंत्र आज विशेष रूप से हमारा मार्गदर्शन करता है
“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।” अर्थात् सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार हमारे पास आएँ।
लोकतंत्र की सफलता भी इसी भावना में निहित है कि मत अलग हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र और समाज के हित का लक्ष्य एक होना चाहिए।
उपनिषदों की प्रार्थना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है-
“असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥”
अर्थात् हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरता की ओर ले चलिए।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
जनप्रतिनिधि के रूप में हमारा धर्म है कि हम निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करें और जनसेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
“परहित सरिस धरम नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई।”
जनप्रतिनिधि का धर्म भी यही है कि वह अपने निजी हितों से ऊपर उठकर जनता के कल्याण को सर्वोपरि रखे।
महाभारत के शान्ति पर्व में राजधर्म का सार बताते हुए कहा गया है कि शासन का उद्देश्य प्रजा की सुरक्षा, न्याय और समृद्धि है। यही भावना भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है।
भारत के महान संतों और मनीषियों ने सदैव लोकमंगल का संदेश दिया। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-
“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”
आज हमारा लक्ष्य एक समृद्ध, शिक्षित, विकसित और आत्मनिर्भर बिहार का निर्माण है।
महात्मा गांधी ने कहा था-
“आप वह परिवर्तन बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।”
यदि हम सदन में अनुशासन, शालीनता और सकारात्मक संवाद का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे, तो लोकतंत्र और अधिक मजबूत होगा।
भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था-
“संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले अच्छे नहीं होंगे तो वह सफल नहीं होगा।”
यह कथन हमें स्मरण कराता है कि संविधान की सफलता हमारे आचरण, उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों के पालन पर निर्भर करती है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सर्वोपरि मानते हुए कहा था-
“राष्ट्र सर्वोपरि हैः उसके हित से बढ़कर कोई हित नहीं हो सकता।”
यह भावना हम सभी जनप्रतिनिधियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है कि दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर बिहार और भारत के व्यापक हित में कार्य करें।
बिहार की धरती ज्ञान, तप, त्याग और लोकतांत्रिक परंपराओं की भूमि रही है। भगवान बुद्ध ने यहीं करुणा का संदेश दिया, भगवान महावीर ने अहिंसा का मार्ग दिखाया, चाणक्य ने सुशासन की अवधारणा विकसित की और नालंदा तथा विक्रमशिला ने विश्व को ज्ञान का प्रकाश दिया।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “दिनकर” की पंक्तियाँ आज विशेष रूप से हम सबको प्रेरित करती हैं
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याधः
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”
और उनकी एक अन्य प्रेरक पंक्ति-
“मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।”
ये पंक्तियाँ हमें बताती हैं कि दृढ़ संकल्प, परिश्रम और जनसेवा से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
मेरा विश्वास है कि इन कार्यक्रमों से माननीय सदस्य अपने दायित्वों का निर्वहन और अधिक दक्षता एवं प्रभावशीलता के साथ कर सकेंगे।

माननीय सदस्यगण, मानसून सत्र राज्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दौरान अनेक विधायी, वित्तीय एवं जनहित से जुड़े विषय सदन के समक्ष आएँगे। मैं सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के सभी माननीय सदस्यों से आग्रह करता हूँ कि वे लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान करते हुए सदन की कार्यवाही में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें। स्वस्थ बहस, सार्थक विमर्श और रचनात्मक सहयोग ही लोकतंत्र कीवास्तविक शक्ति हैं। इसके माध्यम से ही यह सदन उच्च आदर्शों के अनुरूप नई कार्य-संस्कृति स्थापित कर पाएगी।
माननीय सदस्यों,
यह सदन बहस का मंच है, संघर्ष का नहींः तर्क का मंच है, कटुता का नहींः समाधान का मंच है, टकराव का नहीं। जनता ने हम सबको अपने विश्वास का प्रतिनिधि बनाकर यहाँ भेजा है। हमारा प्रत्येक शब्द, प्रत्येक निर्णय और प्रत्येक आचरण लोकतंत्र की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है।
मैं सभी माननीय सदस्यों से आग्रह करता हूँ कि इस पाँच दिवसीय सत्र के दौरान प्रश्नकाल, शून्यकाल, विधायी कार्य तथा विभिन्न विषयों पर होने वाली चर्चाओं में सक्रिय, तथ्यपूर्ण और रचनात्मक भागीदारी करें। बिहार के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, युवाओं के भविष्य, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और सुशासन जैसे विषयों पर सार्थक विमर्श करें।
इसी प्रकार ऋग्वेद का एक और महान मंत्र है-
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
अर्थात् हम साथ चलें, साथ विचार करें और हमारे मन एक
उद्देश्य के लिए समर्पित हों।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि यह सत्र लोकतांत्रिक गरिमा, संसदीय परंपराओं, अनुशासन, संवैधानिक मूल्यों और जनहितकारी निर्णयों के लिए सदैव स्मरणीय बनेगा।
इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ मैं बिहार विधानसभा के पाँच दिवसीय तृतीय सत्र में आप सभी माननीय सदस्यों का पुनः हार्दिक स्वागत, अभिनंदन और सफल कार्यवाही के लिए शुभकामनाएँ देता हूँ।
धन्यवाद ।
भारत माता की जय ! जय हिन्द ! जय बिहार !
