भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना में दिनांक 6 नवंबर, 2026 को जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर सतत बकरी पालन के माध्यम से जनजातीय महिला किसानों के सशक्तिकरण हेतु कार्यशाला-सह-क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन संस्थान की क्षेत्रीय इकाई अखिल भारतीय बकरी सुधार समन्वित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत किया गया।
कार्यक्रम में जमुई जिले के कोरासी गांव की जनजातीय महिला किसानों ने भाग लिया। ये महिला किसान अखिल भारतीय बकरी सुधार समन्वित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत चयनित एवं संबद्ध हैं। कार्यक्रम के दौरान क्षमता निर्माण एवं महिला किसानों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रतिभागियों के बीच सोलर लैंप, जीआई टब तथा वेलनेस किट का वितरण किया गया।
इस अवसर पर संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा ने केवल जनजातीय समाज के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के उत्थान और जागरूकता के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया था। हमें भगवान बिरसा मुंडा के आदर्शों एवं विचारों को आगे बढ़ाते हुए समाज के विकास और सशक्तिकरण के लिए निरंतर कार्य करना चाहिए। उन्होंने जनजातीय किसानों से संस्थान के साथ जुड़ने तथा वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि किसानों को आय एवं रोजगार सृजन के साथ-साथ पोषण सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। वैज्ञानिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाकर जनजातीय समुदाय अपनी आजीविका और जीवन स्तर में महत्वपूर्ण सुधार ला सकता है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अदलुल इस्लाम ने जनजातीय क्षेत्रों में उपलब्ध स्थानीय संसाधनों के वैज्ञानिक एवं टिकाऊ उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर बकरी पालन को जनजातीय महिलाओं की आजीविका एवं आर्थिक सशक्तिकरण का प्रभावी माध्यम बनाया जा सकता है।
डॉ. आशुतोष उपाध्याय, प्रमुख, भूमि एवं जल प्रबंधन प्रभाग ने सतत एवं लाभकारी बकरी पालन में नस्ल सुधार, संतुलित पोषण, पशु स्वास्थ्य तथा वैज्ञानिक प्रबंधन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इन सभी पहलुओं को समग्र रूप से अपनाकर बकरी पालन को जनजातीय परिवारों के लिए एक टिकाऊ एवं लाभकारी आजीविका का माध्यम बनाया जा सकता है।
इस अवसर पर संस्थान में कार्यरत अनुसूचित जनजाति समुदाय के कर्मचारियों को भी सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का समन्वय प्रधान वैज्ञानिक डॉ. शंकर दयाल ने किया, जबकि संचालन वैज्ञानिक डॉ. नीति लखानी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पी. के. राय द्वारा प्रस्तुत किया गया।
