भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बिहार राज्य सचिवमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान की निंदा की है। अमित शाह को ज्ञान का अभाव है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिस समय अंग्रेजों से लड़ रही थी, उस वक्त भाजपा के मातृत्व संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ( आर.एस.एस.) अंग्रेजों की दलाली में लगा हुआ था।
भाकपा के राज्य सचिव रामनरेश पाण्डेय ने कहा कि अमित शााह का ब्यान न केवल गलत है, बल्कि यह शर्मनाक और अज्ञानता से भरा हुआ है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म 1925 में कानपुर में भारत के अपने उपनिवेश-विरोधी आंदोलन से हुआ था। जिसे उन मजदूरों, किसानों और क्रांतिकारियों ने आकार दिया था जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ रहे थे। इसके औपचारिक गठन से पहले भी, कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को ष्क्राउन (ब्रिटिश राजसत्ता) के खिलाफ युद्ध छेड़नेष् के षड्यंत्र के मामलों में जेलों में डाला जा रहा था। ब्रिटिश औपनिवेशिक हलकों में कम्युनिज्म का खौफ इतना ज्यादा था। क्या आर.एस.एस. ऐसा एक भी उदाहरण दिखा सकता है?

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अनगिनत मुक्ति आंदोलनों की तरह रूसी क्रांति से वैचारिक प्रेरणा ली, लेकिन इसका कार्यक्षेत्र और व्यवहार हमेशा भारतीय वास्तविकताओं में ही निहित रहा। यह कम्युनिस्ट विचारधारा ही थी जिसने भगत सिंह और सूर्य सेन जैसे शहीद और क्रांतिकारी, सोहन सिंह भकना जैसे उपनिवेश-विरोधी लड़ाके, एम. सिंगारवेलु जैसे मजदूर आंदोलन के अग्रदूत, स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसे किसान नेता और वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जैसे निडर देशभक्त पैदा किए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को निशाना बनाने के अपने छिछले प्रयास में, अमित शाह ने सर्वोच्च बलिदानों और संघर्षों की इस पूरी विरासत का अपमान किया है। आर.एस.एस. का वैचारिक और सांगठनिक जड़ें स्पष्ट रूप से विदेशी और चिंताजनक हैं। बी.एस. मुंजे जैसी हस्तियों ने बेनिटो मुसोलिनी के साथ संपर्क रखा, और एम.एस. गोलवलकर ने एडॉल्फ हिटलर की नीतियों की प्रशंसा की। इससे भी ज्यादा चैंकाने वाली बात संघ के अपने पहले महासचिव, बालाजी हुद्दार का सफर हैय वे हेडगेवार की आज्ञाकारिता और भारत को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन रखने में उनकी मिलीभगत से इतने निराश हुए कि उन्होंने संघ छोड़ दिया और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। जहाँ एक ओर कम्युनिस्टों को औपनिवेशिक सत्ता का सामना करने के लिए जेल, प्रतिबंध और दमन झेलना पड़ा, वहीं दूसरी ओर संघ आज्ञाकारी बना रहा और उपनिवेश-विरोधी संघर्षों से दूर रहकर ब्रिटिश सत्ता की मिलीभगत में शामिल रहा। काला पानी की बैरकें कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों से भरी हुई थीं, जबकि दक्षिणपंथी विचारधारा की हस्तियाँ ब्रिटिश पेंशन पर पल रही थीं।
