मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी के कुशल नेतृत्व में बिहार की पंचायती राज संस्थाएँ ग्रामीण विकास के साथ-साथ शिक्षा, महिला सशक्तीकरण, बाल अधिकार और सामाजिक समानता को बढ़ावा देने वाली परिवर्तनकारी संस्थाओं के रूप में आगे बढ़ रही हैं। पंचायत जनप्रतिनिधि अब स्थानीय आधारभूत संरचनाओं के निर्माण के साथ गांव की उन बेटियों के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं, जिनकी पढ़ाई आर्थिक कठिनाइयों, असुरक्षा, पारिवारिक परिस्थितियों, सामाजिक रूढ़ियों अथवा आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में छूट गई थी।
पंचायती राज विभाग, बिहार के मार्गदर्शन में महिला हितैषी एवं बाल हितैषी ग्राम पंचायतों की अवधारणा को धरातल पर उतारते हुए पंचायत प्रतिनिधियों, जीविका दीदियों, विद्यालय प्रबंधन और स्थानीय समुदाय के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित किया जा रहा है। इसके माध्यम से विद्यालय से बाहर हो चुकी बालिकाओं की पहचान, परिवारों की काउंसलिंग, आवश्यक दस्तावेजों का निर्माण और पुनः नामांकन सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं।

माननीय मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी की मानवीय एवं दूरदर्शी सोच के अनुरूप राज्य सरकार का प्रयास है कि ग्रामीण विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और प्रत्येक बच्चे को शिक्षा एवं विकास का समान अवसर मिले। बालिकाओं को पुनः विद्यालय से जोड़ने की यह पहल शिक्षा को पंचायतों के विकास एजेंडे का अभिन्न हिस्सा बना रही है।
शिक्षा से समग्र विकास को गति दे रहीं पंचायतें
स्थानीयकृत सतत विकास लक्ष्यों के अंतर्गत महिला हितैषी ग्राम पंचायत और बाल हितैषी ग्राम पंचायत की परिकल्पना ने पंचायतों की भूमिका को व्यापक बनाया है। पंचायतों के विकास का आकलन अब केवल सड़कों, नालियों, भवनों और अन्य भौतिक परिसंपत्तियों से नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा, बालिकाओं की सुरक्षा, महिलाओं की भागीदारी और कमजोर परिवारों तक सरकारी सुविधाओं की पहुंच के आधार पर भी किया जा रहा है।
इसी दिशा में राज्य के अनेक जिलों के 171 प्रखंडों में पंचायत प्रतिनिधियों और जीविका स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी दीदियों द्वारा शिक्षा से वंचित बालिकाओं के मामलों की पहचान कर कार्रवाई की गई है। तकनीकी सहयोगी संस्था C3 ने इस प्रक्रिया में सहयोग प्रदान किया है, जबकि अभियान का नेतृत्व पंचायत जनप्रतिनिधियों, जीविका दीदियों, विद्यालयों और स्थानीय समुदाय द्वारा किया जा रहा है।
जीविका दीदियाँ परिवारों और सरकारी व्यवस्था के बीच विश्वास की महत्वपूर्ण कड़ी बनी हैं। वे घर-घर जाकर स्कूल छोड़ चुकी बालिकाओं की पहचान करती हैं, माता-पिता से संवाद करती हैं और उन्हें शिक्षा का महत्व समझाती हैं। जहां आर्थिक समस्या सामने आती है, वहां परिवार को सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाती है। जहां जन्म प्रमाण-पत्र, आधार कार्ड, बैंक खाता अथवा विद्यालयी दस्तावेजों का अभाव होता है, वहां पंचायत प्रतिनिधियों के सहयोग से आवश्यक प्रक्रियाएँ पूरी कराई जाती हैं।

सुरक्षा का भरोसा मिला तो स्कूल लौटी निशु
पटना जिले के नौबतपुर प्रखंड की दरियापुर पंचायत निवासी 15 वर्षीय निशु कुमारी ने विद्यालय आने-जाने के दौरान असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न होने के कारण स्कूल जाना बंद कर दिया था। परिवार ने भी उसकी सुरक्षा को देखते हुए पढ़ाई छुड़ाने का निर्णय ले लिया था।
मामले की जानकारी मिलने के बाद वार्ड सदस्य मीना देवी ने परिवार से संवाद प्रारंभ किया। जीविका दीदियों, विद्यालय के प्रधानाध्यापक और पंचायत प्रतिनिधियों ने मिलकर सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने की पहल की। सामूहिक प्रयास के बाद निशु पुनः विद्यालय लौट सकी।
निशु कुमारी ने कहा, “पहले मुझे स्कूल जाने में डर लगता था। अब दीदियों और शिक्षकों के सहयोग से मेरा आत्मविश्वास वापस आ गया है। मैं नियमित रूप से स्कूल जाती हूँ और आगे पढ़ना चाहती हूँ।”
पंचायत प्रतिनिधियों एवं जीविका दीदियों ने मिल कर प्रारंभ कराई नंदिनी की स्कूलिंग
मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड की पोखरैरा पंचायत निवासी 17 वर्षीय नंदिनी कुमारी की पढ़ाई सामाजिक दबाव और परिवार की आशंकाओं के कारण रुक गई थी। जीविका दीदियों और पंचायत प्रतिनिधियों ने परिवार के साथ कई दौर की बातचीत की। बैठकों में बेटी की शिक्षा, समान अवसर और परिवार की भूमिका पर चर्चा की गई।
लगातार संवाद के बाद परिवार की सोच बदली और नंदिनी का पुनः नामांकन कराया गया।
नंदिनी कुमारी ने कहा, “मैं पढ़ना चाहती थी, लेकिन परिस्थितियों ने मुझे रोक दिया। अब मैं फिर से अपने सपनों की ओर बढ़ रही हूँ।”
यह सफलता दिखाती है कि पंचायत प्रतिनिधि सामाजिक रूढ़ियों को संवाद और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से बदलने में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।
आर्थिक संकट भी नहीं रोक सका गुलशन का सपना
मधुबनी जिले के पंडौल प्रखंड की उदयपुर विठुआर पंचायत निवासी गुलशन खातून के पिता की असामयिक मृत्यु के बाद परिवार गंभीर आर्थिक संकट से घिर गया था। परिवार के सामने आजीविका चलाने की चुनौती थी और गुलशन की पढ़ाई बीच में ही छूट गई।
पंचायत प्रतिनिधियों और जीविका समूह ने परिवार की परिस्थिति को समझते हुए गुलशन का आधार कार्ड, बैंक खाता और विद्यालय से संबंधित आवश्यक दस्तावेज तैयार कराने में सहयोग किया। इसके बाद उसके पुनः नामांकन की प्रक्रिया पूरी कराई गई।
गुलशन खातून ने कहा, “मुझे लगा था कि अब मैं कभी स्कूल नहीं जा पाऊँगी, लेकिन सभी के सहयोग से मेरी पढ़ाई फिर शुरू हो गई।”
घरेलू जिम्मेदारियों से निकलकर किताबों तक पहुंची संध्या
मधुबनी जिले के राजनगर प्रखंड की पटवारा उत्तरी पंचायत निवासी संध्या कुमारी की मां की मृत्यु के बाद उसे रिश्तेदारों के घर रहना पड़ा। घरेलू कार्यों के बोझ और पारिवारिक दबाव के कारण उसकी पढ़ाई लगभग एक वर्ष से बंद थी।
वार्ड सदस्य ममता देवी और जीविका समूह की महिलाओं ने परिवार को बालिका के शिक्षा के अधिकार और उसके भविष्य के बारे में समझाया। निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप संध्या का पुनः नामांकन कराया गया।
संध्या कुमारी ने कहा, “मैं हमेशा पढ़ना चाहती थी। अब मुझे लगता है कि मेरा सपना पूरा हो सकता है।”
_दस्तावेज बने शिक्षा का प्रवेश-द्वार
_
मधुबनी जिले के राजनगर प्रखंड की पटवारा दक्षिणी पंचायत निवासी 11 वर्षीय काजल और 10 वर्षीय आंचल ने पहले कभी विद्यालय में प्रवेश नहीं लिया था। परिवार की आर्थिक स्थिति के साथ जन्म प्रमाण-पत्र और आधार कार्ड जैसे आवश्यक दस्तावेजों का अभाव उनके नामांकन में बड़ी बाधा थी।
पंचायत प्रतिनिधियों और जीविका दीदियों के सहयोग से दोनों बहनों के आवश्यक दस्तावेज तैयार कराए गए और पहली बार विद्यालय में उनका नामांकन सुनिश्चित हुआ।
काजल और आंचल ने कहा, “स्कूल की यूनिफॉर्म पहनकर बहुत अच्छा लगता है। अब हम भी पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहते हैं।”
स्वयं पढ़ी, अब दूसरी बेटियों को प्रेरित कर रही सुगंधा
नालंदा जिले के राजगीर प्रखंड की लोदीपुर पंचायत निवासी सुगंधा कुमारी धीरे-धीरे विद्यालय से दूर हो गई थी। पंचायत प्रतिनिधियों, शिक्षकों और जीविका दीदियों के सामूहिक प्रयास से वह पुनः शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ी।
आज सुगंधा केवल स्वयं पढ़ाई नहीं कर रही है, बल्कि किशोरी समूह की सक्रिय सदस्य के रूप में दूसरी बालिकाओं को भी विद्यालय जाने के लिए प्रेरित कर रही है। वह बाल विवाह के विरुद्ध जागरूकता फैलाने में भी सहयोग कर रही है।
सुगंधा कुमारी ने कहा, “पहले मैं अपनी पढ़ाई को लेकर गंभीर नहीं थी। अब मैं दूसरी लड़कियों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करती हूँ।”
पंचायती राज विभाग के माननीय मंत्री दीपक प्रकाश ने कहा, “माननीय मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बिहार सरकार पंचायतों को समग्र ग्रामीण विकास और सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख केंद्र बना रही है। पंचायतें केवल आधारभूत संरचना के निर्माण की इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि वे बच्चों की शिक्षा, बालिकाओं की सुरक्षा, महिलाओं के सम्मान और कमजोर वर्गों के अधिकारों की प्रथम संरक्षक भी हैं।”
उन्होंने कहा, “किसी भी बालिका की पढ़ाई गरीबी, असुरक्षा, सामाजिक रूढ़ियों अथवा आवश्यक दस्तावेजों की कमी के कारण नहीं रुकनी चाहिए। पंचायत प्रतिनिधियों, जीविका दीदियों, विद्यालयों और स्थानीय समुदाय का यह समन्वित प्रयास बाल हितैषी एवं महिला हितैषी पंचायतों की परिकल्पना को साकार कर रहा है। प्रत्येक बेटी की विद्यालय में वापसी पूरे समाज की सफलता है।”
जनप्रतिनिधियों की सक्रियता से मजबूत हो रहा स्थानीय शासन
बालिकाओं की विद्यालय वापसी से जुड़े ये प्रयासराज्य के पंचायती राज संस्थाओं के वास्तविक सशक्तीकरण को प्रदर्शित करते हैं। किसी पंचायत का सशक्तीकरण केवल उसे वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार देने तक सीमित नहीं है। वास्तविक सशक्तीकरण तब होता है, जब जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की सामाजिक समस्याओं की पहचान करें, परिवारों तक पहुंचें, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करें और समाधान की प्रक्रिया का नेतृत्व करें।
बालिका का विद्यालय लौटना केवल उसकी पढ़ाई की पुनः शुरुआत नहीं है। इससे उसके आत्मविश्वास, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता, कौशल विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की क्षमता भी मजबूत होती है। शिक्षित बालिकाएँ आगे चलकर अपने परिवार और समुदाय के विकास में सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
इस प्रकार बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने की यह पहल महिला सशक्तीकरण, बाल विवाह की रोकथाम, गरीबी उन्मूलन, कौशल विकास और सक्षम मानव संसाधन के निर्माण जैसे अनेक विकास लक्ष्यों को एक साथ आगे बढ़ा रही है।

सहयोग से समाधान, शिक्षा से समृद्धि
पंचायती राज विभाग, द्वारा लक्षित योजना निर्माण, जनप्रतिनिधियों के क्षमता संवर्धन हेतु विभाग द्वारा नियमित रूप से आयोजित किए जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम, जीविका दीदियों की सामाजिक पहुंच, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की सक्रियता और उनके सहयोग से ग्रामीण बिहार में शिक्षा के माध्यम से सकारात्मक परिवर्तन की नई कहानी लिखी जा रही है।
गांव की चौखट से निकलकर विद्यालय तक पहुंचती प्रत्येक बेटी इस बात का प्रमाण है कि जब सरकार, पंचायत और समुदाय एक साथ आगे बढ़ते हैं, तो सामाजिक बाधाएँ टूटती हैं, सपनों को नई उड़ान मिलती है और विकसित भारत–समृद्ध बिहार की मजबूत नींव तैयार होती है।
